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गोंडी पुनेम दर्शन का अभिप्राय

अभिप्राय

पारी कुपार लिंगो गोंडी पुनेम दर्शन एक शोषपूर्ण ग्रंथ है। यह पुस्तक लिखने के लिये लेखक विरु मोतीरावण कंगाली ने काफी मेहनत की है। उन्होंने प्राचीन ग्रंथ किताबें, मासिक पत्रिकाएं, गोंड समुदाय के विभिन्न संगठनों के प्राचीन पत्रक पारंपारिक लोक गीत, धार्मिक जनश्रुतियों का बहुत ही गहराई से अध्ययन किया है। इसी तरह गोंड समुदाय के धार्मिक स्थल जैसे पेन्कमेडी, अमूरकोट, सेमरगाव, कचारगढ़, बाजागढ़, भिमगढ़, केसलागुडा, मेडाराम आदि जगह जाकर उस परिक्षेत्र में निवास करनेवाले लोगों से मिलकर विभिन्न धार्मिक और सामुदायिक पर्वों पर गाये जानेवाले गीतों का संकलन कर उनके माध्यम से इस ग्रंथ को लिपिबद्ध किया है। लेखक को गोंडी, अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, तुल्लु, तोडा, मालतो, कोलामी आदि भाषाओं की अच्छी जानकारी होने से और स्वयं समाज शास्त्र, नृतत्व शास्त्र एवं भाषा विज्ञान के जानकार होने के कारण इस ग्रंथ को सुबबद्ध रूप से लिखने में वे कामयाब हो सके।

आजतक मैंने गोंड सगा समुदाय पर जो भी लिखित साहित्य एवं किताबें पढ़ी | उसमें पारी कुपार लिंगो के विषय में सविस्तर रूप से जानकारी नहीं मिली। आर्यों के | आगमन पूर्व काल में कई हजारों वर्ष पहले पारी कुपार लिगो जैसा महा जीवगण्ड इस समुदाय में हुआ जिसने गोंडी पुनेम याने कोया वंशीय गण्डजीवों की जीवन व्यवस्था या जीवन मार्ग की संस्थापना की उनकी सगायुक्त सामुदायिक व्यवस्था प्रस्थापित की, सम विषम गुण संस्कारों के आधार पर आपसी वैवाहिक संबंध प्रस्थापित करने की व्यवस्था बनाई और प्रकृति के नियम एवं न्याय तत्वों पर आधारित उनके क्रिया कलाप | निर्धारित किये और उस अनुसार जीवन जीने का मार्ग बताया जिसे गोंडी पुनेम दर्शन | अर्थात् गोंदोलाई (सामुदायिक) जीवन मार्ग कहा जाता है। इस पुनेम का जय सेवा दर्शन और मुन्दमुन्शूल मार्ग ऐसे मूल्यों से परिपूर्ण है जिसमें व्यक्ति विशेष के कल्याण को कोई महत्व नहीं है, सगा समुदाय का कल्याण साध्य करना ही इस पुनेम का अंतिम लक्ष है क्योंकि सगा जनकल्याण में ही व्यक्ति विशेष का कल्याण अंतर्भूत है।

पारी कुपार लिंगो के जन्म के विषय में गोंड सगा समुदाय में आज भी जो पाटांग (गीत) प्रचलित है उनका संकलन इस ग्रंथ में दिया गया है। लोक गीत, लोक कथाओं का संग्रह करने के लिये लेखक ने महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उडीसा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के दुर्गम विभाग में निवास करनेवाले गोंड समुदाय के लोगों में प्रत्यक्ष जाकर सम्पर्क बनाया, उनके तीज तिहारों का दार्शनिक रूप अध्ययन किया और अपनी कलम लिपिबद्ध किया है, जो बहुत ही सराहनीय कार्य है। उसी तरह इस समुदाय के सभी रीति रिवाजों और संस्कारों का अध्ययन कर उनके पीछे जो दार्शनिक महत्व है उसे इस ग्रंथ के माध्यम से उजागर किया है। इसके अतिरिक्त उनकी पंचायत व्यवस्था का अध्ययन कर उनके रिवाजो कानून को लिपिबद्ध कर उसे संहिता का रूप दिया है, जिसके लिये लेखक धन्यवाद के पात्र है।

आज तक गोंडी पुनेम के बारे में किसी ने भी इतने विस्तिर्ण ढंग से अध्ययन नहीं किया है। फादर एल्विन, आर. की. रसल, हेमन्डॉर्फ, सेतु माधव पगड़ी, बी एच. मेहता आदि अनेक समाज शास्त्रियों ने गोंड समुदाय की सभ्यता और संस्कृति के विषय में जो कुछ भी लिखा है वह मात्र उनके उपरी क्रिया कलापों की जानकारी मात्र है किन्तु उनके संस्कृति के मूल्यों के पीछे उनका अपना क्या दार्शनिक आधार है इस विषय में गहराई तक किसी ने अध्ययन नहीं किया है। इसलिये लेखक का यह ग्रंथ प्रबुद्ध पाठकों तथा शोधकर्ताओं के जिये अत्यंत उपयुक्त साबित होगा।

लेखक ने गोंड समुदाय की जो परिभाषा की है वह बहुत ही व्यापक है, जिसमें वे सभी समुदाय समाहित है, जिनमें सगा घटक युक्त सामुदायिक व्यवस्था है, जो विशेष गोत्रनामों से जाने जाते है, जिनके प्रत्येक गोत्र धारक के पेड़ पौदे या प्राणिमात्र गोत्र चिन्ह होते हैं, जो परसापेन, बुढालपेन, सरनापेन, हजोरपेन, फड़ायेन या सिंगाबोंगा पेन की उपासना करते हैं और जिनकी मातृभाषा गोंडी है। आम तौर पर ओरों के द्वारा यह कहा जाता है कि जनजातियां हिन्दु व्यवस्था में समाहित है। परंतु यह सत्य नहीं है क्योंकि हिन्दु कानून की जो (१) हिन्दु विवाह अधिनियम (२) हिन्दु उत्तराधिकार अधिनियम (३) हिन्दु दत्तक ग्रहण एवं सम्पोषण अधिनियम और (४) हिन्दु अल्पसंख्यक एवं संरक्षण अधिनियम बनाये गये हैं उनकी प्रयुक्ति के लिये उन अधिनियम के धारा क्र. २ के उपधाराओं में हिन्दुओं की जो व्याख्या की गई है वह जनजातियों के किसी भी सदस्य को लागू नहीं होतो ऐसा स्पष्ट उल्लेख धारा क्र. २ के उपधारा क्र.२ में है।

इस ग्रंथ के प्रकाशन से गोंड समुदाय के बारे में अन्य लोगों में जो मिथ्या धारणाएं तथा मान्यताएं है वे गलत साबित होते हैं। इसलिये कोया वंशीय गॉड सगा समुदाय लेखक का सदा कृतज्ञ रहेगा। मैं लेखक को अपनी शुभकामनाएं। देता हूं और उनसे इस समुदाय को अधिक से अधिक साहित्य देने तथा सेवा करने की अपेक्षा करता हूँ। जय सेवा ! दि. २०.९.८९

शीतल कवडु मरकाम,

नागपुर)

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